चित्र हमेशा कीमती पलो को उजागर करती हैं | जैसा कि हम सभी जानते हैं हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कुल सोलह संस्कारो को पूर्ण कर जीवन को पूर्णरूप से व्यतीत करते हैं | जिसमे विवाह पंद्रहवा संस्कार हैं और इस परंपरा को मनुष्य बड़े ही धूमधाम से मनाता हैं |कुछ अपवाद व्यक्ति को छोड़ हर मनुष्य खुद भी इस पावन परिणय के बंधन में बंधते हैं और कइयों के इस परम्परा में शामिल हो , उस ख़ुशी के पल में सरिक हो उदहारण बनते आ रहें हैं | वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो इस समय उच्छृंखल यौनाचार था जैसा कि आज भी जानवर समुदाय में होता हैं | कालांतर में हमारे ऋषि मनीषियों ने पारिवारिक एकता व अनुशासित जीवन के अलावा इस उच्छृंखलता यौनाचार को भी समाप्त करने के लिए विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किए | हमारे ऋषि मुनियो द्वारा विभाजित विवाह के कुल आठ प्रकार के रीति रिवाजो में से हम और हमारा समाज पिछले कई वर्षो से ब्रह्म विवाह के अंतर्गत तय विधि को मानकर इसके हिस्से बनते आ रहें हैं | जिसमे वर वधु और वर वधु के सगे सम्बन्धी एक दूसरे के पसंद नापसंद में तालमेल बिठा इसे प्रेमिल रूप प्रदान कर दोनों पक्षो में परस्पर सहमति के पश्चात सदा के लिए एक दूसरे के हर सुख-दुःख का हिस्सा बन जाता हैं और इसके साथ ही मनुष्य अपने गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर जाता हैं | और यह बहुत ही आनंद की बात होती हैं जब मनुष्य अपने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता हैं | इन लभली कपल (भैया -भाभी) को असीमित शुभकामनाएं सहित विवाह की ढ़ेरो-ढ़ेर हार्दिक बधाई व प्यार, लभ बर्ड्स अपने नई पारी में भी तरक्की की ओर अग्रसर रहेंगे यही मेरी कामना रहेगी | दाम्पत्य जीवन सुखमय हो, खुशमय हो, हर कार्य शुभ-शुभ हो | माँ भवानी की कृपा सदैव इनपर बनी रहें |
दिल्ली
कितनी बार उजड़ने के बाद यमुना नदी किनारे स्थित अरावली पहाड़ी पर रचा बसा शहर दिल्ली भारत की राजधानी कहलाती हैं | इतिहास की पन्नों में उल्लेखित प्राचीन काल (महाभारत काल) में इसका नाम इंद्रप्रस्थ था | विभिन्न प्रान्तो, धर्मों एवं जातियों के लोगों के दिल्ली में बसने के कारण दिल्ली का शहरीकरण तेजी से हुआ ही साथ ही यहाँ एक मिश्रित संस्कृति ने भी जन्म लें लिया, जिस वजह से दिल्ली की अपनी मुख्य संस्कृति उभर नहीं पाई, धीरे-धीरे गुम होते जा रहीं | भारत में पश्चिमी संस्कृति का उदभव भी सर्वप्रथम दिल्ली और मुंबई से ही होती हैं | दिल्ली में कई राजाओं के साम्राज्य के उदय तथा पतन के साक्ष्य आज भी विद्यमान हैं | भारत की आजादी से पहले महाराज पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का अन्तिम हिन्दू सम्राट माना जाता है, इसके बाद मुग़ल, मुग़ल के बाद अंग्रेजो के शासन की शुरुआत होती हैं | भारत की आजादी बाद लगभग साठ वर्ष कांग्रेस तो पिछले आठ वर्षो से भारतीय जनता पार्टी खुद को दिल्ली (केंद्र) में स्थापित कर भारत को प्रगतिशील बनाकर विकसित की श्रेणी में लाने के लिए लगातार प्रयत्नशील हैं |दिल्ली में चांदनी चौक, सदर बाजार, पहाड़गंज, करोल बाग, कनॉट प्लेस ,आदि क्षेत्रों में अनेक प्रकार की वस्तुओं का क्रय विक्रय होता है | दिल्ली के हर कोने पर पुराने खंडहर अपने अस्तित्व वैभव की याद दिलाते हैं | यहां के ऐतिहासिक स्थल अपने मुख भाषा में अपने वैभव व संस्कृति की कहानी सुनाते हैं | भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों के प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में ही स्थित हैं | दिल्ली राजधानी होने के नाते केंद्र सरकार की तीनों इकाइयों – कार्यपालिका, संसद और न्यायपालिका के मुख्यालय भी दिल्ली (नई दिल्ली) में स्थापित हैं | दिल्ली
व्यापार और शिक्षा का बड़ा केंद्र हैं | दिल्ली में राष्ट्रपति भवन की सीध में ही इंडिया गेट हैं, जो भारत के शहीदों को समर्पित हैं | इंडिया गेट पर वतन की खातिर जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों के स्मरण में ज्योति जलती रहती हैं | हाल ही में इंडिया गेट के ही समीप एक छतरी के नीचे मूर्ति कलाकार अरुण योगिराज के नेतृत्व में भारत की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी सुभाषचंद्र बोस जी की 28 फुट उंची प्रतिमा स्थापित की गई | साथ ही सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत अंग्रेज कालीन संसद भवन के स्थान पर एक नए संसद भवन, प्रधानमंत्री और उप राष्ट्रपति के आवास के साथ कई नए कार्यालय भवन और मंत्रालय के कार्यालयों के लिए केंद्रीय सचिवालय का निर्माण किया जा रहा है (इंडिया गेट से लेकर जो रास्ता राष्ट्रपति भवन तक जाता है उस पूरे इलाके को सेंट्रल विस्टा के नाम से जाना जाता है)| इंडिया गेट के पास ही ‘राजपथ’ का नाम भी बदलकर अब कर्तव्य पथ कर दिया गया है, जहां राष्ट्रीय पर्व के शुभ अवसर पर परेड, सांस्कृतिक झांकी व कई साहसिक सैन्य गतिविधियों का प्रदर्शन किया जाता हैं | दिल्ली में मेट्रो सेवा ने इसके दौड़ने की गति को बढ़ाया हैं | भारत की स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) तथा गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) को दिल्ली में एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता हैं | दिल्ली राज्य भारत के सभी शहरों से एयरपोर्ट और रेलवे कनेक्टिविटी के जरिए अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है | दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा पुस्तक मेला का आयोजन होता हैं | यहां प्रगति मैदान के अलावा दिल्ली हाट व हौज खास में कलाओ का बाजार लगता हैं,जहां विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प और हठकरघों के कार्य के नमूने मिलते हैं | पर्यटन की दृष्टिकोण से दिल्ली आने वाले अक्षरधाम, लालकिला, कमल मंदिर (लोटस टेम्पल), इंडिया गेट घूमने जाते ही जाते हैं, और बाजार में राजीव चौक स्थित कनॉट प्लेस (पालिका बाजार) व चांदनी चौक, इसके अलावा भी धार्मिक स्थल को छोड़ कई स्थल हैं जहां अच्छे लोग अब घूमने नहीं जाते हैं, आजकल के निब्बा-निब्बी द्वारा जानवरो की तरह व्यवहार (अश्लील हरकत) करने के कारण | शिक्षा, व्यापार, जॉब, देश की राजधानी, पर्यटक स्थल, कई महत्वपूर्ण मुख्यालय स्थल होने के बावजूद दिलो को लुभाने वाली दिल्ली में अब कई लोग वहां जाना नहीं चाहते, वहां रहना नहीं चाहते और जों हैं वो किसी ना किसी मजबूरी बस रह रहे | वजह हैं प्रदूषण व दंगा | भारत की पहली व दुनियां की दूसरी सबसे अधिक प्रदूषित शहर में दिल्ली का नाम आता हैं | फॉग के कारण सूर्य सूर्य उदय होने के लगभग घंटे बाद ही दिखती हैं | हालांकि लॉकडाउन के वजह से दिल्ली की वायु गुणवत्ता में काफ़ी सुधार हुआ था मगर लॉकडाउन हटते ही वायु प्रदूषण पुनः काफ़ी ज्वलनशील मुद्दा बन गया हैं इसके अलावा जल प्रदूषण व दंगा | एक सर्वे के अनुसार दिल्ली एनसीआर में ख़राब वायु गुणवत्ता की वजह से सत्तर प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके परिवार के कम से कम एक या एक से अधिक सदस्य वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना कर रहे है, जों औसत आयु में कमी की वजह बनते जा रहीं हैं | बढ़ती वायु प्रदूषण के कारण ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) का तीसरा चरण लागू कर दिया गया हैं | दिल्ली में वायु प्रदूषण के मुख्य कारण हैं – चलती गाड़ीयां , चलती कलकारखाने, दिल्ली व दिल्ली के आसपास जलती पराली एवं कचड़े, कम पेड़-पौधे, दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या | दूसरी तरफ दिल्ली में रहने वालो के लिए जल प्रदूषण भी पीछा कर रहीं हैं, जैसे अभी छठ पूजा में यमुना नदी को लेकर समाचार बनी कि पिछले बीस सालो में लगभग तीन हज़ार करोड़ रूपये यमुना नदी के सफाई पर खर्च किए गए मगर..| एक तरफ दिल्ली में दंगा भी दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं | और जितने भी दंगे हुए सारे एक विकसित देश के लेखक के पुस्तक से प्रेरित पाई गई |
पर्व त्यौहार विशेष
अंग्रेजी वर्ष के अनुसार हिन्दुओ बीच आस्था व विश्वास का महापर्व दीपावली-छठ वर्ष का अंतिम मुख्य पर्व होता हैं | मगर बिते कुछ सालो से पच्चीस दिसंबर को तुलसी पूजन एक विशेष स्थान लेती जा रहीं हैं | हम बात करते है कि हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज़ हमें कैसे सकारात्मक रखती है, हमारे तन मन को स्वस्थ रखती है :- जब हम कोई पर्व मनाते है तो राजसिक और तामसिक भोजन से दूरी बनाते है, साफ सफाई का विशेष ध्यान रखते है| हम उपवास भी करते है, जिसपर मेडिकल साइंस भी कहती है कि हमें एक दिन की साप्ताहिक उपवास भी करनी चाहिए, जिससे शरीर की घर्षण से आतंरिक विकार मल मूत्र के द्वारा बाहर आ जाए या फिर हम उसके लिए प्रतिदिन योगा/व्यायाम करते है| इन सब चीजों से हमारा शरीर हल्का रहता है, हम नकारात्मक विचारों से दूर रह पाते है|त्यौहार से अपनों बीच एकजुटता का आपसी सामंजस्य बना रहता हैं | भारत त्योहारों का देश है, त्यौहार कठिनाई, पीड़ा तथा तनाव को भुलाने का साधन भी होता है| हर पर्व में कुछ नियम, बंधन होती है, जिसे हर कोई उस बंधनों की रक्षा कर अर्थात अपनी संस्कृति का पालन कर अनुशासित रूप में मनाते है, जहां पारिवारिक एकता में भी आपसी सामंजस्य बना रहता है| और हम अनुशासित व सकारात्मक जीवन व्यतीत कर पाते है| त्योहारों से एक नई आशा जगती है, कुछ अच्छा होने का उम्मीद बना रहता है| क्रमशः अब हम बात करते हैं धनतेरस से सामा-चकेवा तक के महत्व का :- #धनतेरस :- दीपावली से दो दिन पूर्व इस दिन माँ लक्ष्मी, श्री गणेश और कुबेर देव जी की भी पूजा होती है | धनतेरस भारत के अधिकतर जगहों पर सायंकाल दीपक जलाकर घर-द्वार, आंगन, दुकान आदि को सजाते हैं | एक पौराणिक कथा में हिन्दू मान्यता के अनुसार धन तेरस के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे | अमृत कलश के अमृत का पान करके देवता अमर हो गए थे | इसीलिए आयु और स्वस्थता की कामना हेतु धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि जी का भी पूजन किया जाता है | धनतेरस के दिन परंपरा रहीं हैं कि लोग बर्तन, सोने/चाँदी के सिक्के/आभूषण, साबुत धनिया, झाड़ू आदि की खरीददारी करते हैं | वर्तमान समय में धनतेरस पर अन्य कुछ भी नए चीजों की खरीददारी प्रचलन में हैं, क्योंकि ऐसा करना घर के लिए शुभ माना जाता हैं और ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन खरीदी गई कोई वस्तु तेरह गुणा अधिक लाभ प्रदान करती हैं | #दीपावली :- दिपो की श्रृंखला से मन को अालोकित करने वाला पर्व अर्थात दीपावली के शुभ अवसर पर प्रत्येक घर में भगवान श्री गणेश और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और साथ ही कई जगहों पर माँ काली की भी पूजा-अर्चना की जाती हैं ताकि घर में ऋद्धि-सिद्धिं बनी रहे | दीपावली के अवसर पर अपने आसपास के वातावरण में नयापन लाने का प्रयास किया जाता हैं, साथ ही माँ लक्ष्मी और श्री गणेश जी के आवागमन के स्वागत में घरो में, व्यापारिक स्थानों पर कई तरह के रंगोली बनाने का भी प्रचलन हैं | प्रत्येक वर्ष यह त्यौहार कार्तिक मास के माह में अक्टूबर नवंबर में मनाया जाता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार दिवाली के त्यौहार को इसलिए भी मनाया जाता है कि चौदह वर्ष के वनवास और रावण का वध करके भगवान श्री राम अपने जन्मभूमि अयोध्या लौटे थे | इसलिए वहां के लोगो के द्वारा अपने चारो ओर कई दिए जला कर उनका स्वागत किए थे , तब से ही दिवाली का त्यौहार प्रत्येक वर्ष अधर्म पर धर्म की, अंधियारे पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतिक के रूप में मनाया जाता है| वर्तमान समय में बिते कुछ सालो से अयोध्या वासी द्वारा अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन भव्य रूप से किया जा रहा | #गोवर्धन_पूजा :- गोवर्धन/अन्नकूट पूजा दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता हैं | इस पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है | इस दिन में श्रीकृष्ण के लीला का वर्णन हैं | नाराज इंद्रदेव द्वारा भारी बरसात कराए जाने पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को ऊँगली पर उठा कर ब्रिज वासियो की रक्षा किए थे | जब गोवर्धन पर्वत को बचाया गया था तो लोगों नें खुशी जताई कि उनके भोजन का स्रोत बच गया है, और श्रद्धांजलि के रूप में, लोग भोजन की देवी यानी माँ अन्नपूर्ण को विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री प्रदान करते हैं | इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन और गायों के पूजा के निमित्त पके हुए अन्न को भोग में लगाए थे | इसीलिए इस दिन का नाम अंकूट पड़ा | कई जगह इस पर्व को गोवर्धन पूजा के नाम से जाना जाता है | इस दिन गाय के गोबर से श्री कृष्ण एवं गोवर्धन पर्वत की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है | गोवर्धन पूजा प्रकृति प्रेम को भी दर्शाता हैं | #भाई_दूज :- रक्षाबंधन के बाद, भाई दूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई-बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है | यह दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता हैं | भाई दूज को लेकर यह मान्यता प्रचलित है, कि इस दिन विवाहित बहनें अपने भाइयों को अपने घर बुलाती है और भाई को तिलक लगाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराती हैं जिससे परस्पर तो प्रेम बढ़ता ही है साथ ही बहन भगवान से भाई की लम्बी उम्र की कामना करती है | चूंकि इस दिन यमुना जी ने अपने भाई यमराज से वचन लिया था, उसके अनुसार भाई दूज मनाने से यमराज के भय से मुक्ति मिलती है, और भाई की उम्र व बहन के सौभाग्य में वृद्धि होती है | #छठ :-
महापर्व_छठपर्व बिहारियों की संस्कृति समझी जाने वाली सूर्योपासना का यह अनुपम छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है | हिन्दू धर्म ग्रंथो व माह अनुसार एक चैत्र (मार्च-अप्रैल) माह में मनाया जाता है जिसे चैतीछठ या छोटी छठ पूजा कहा जाता है | और दूसरी दीपावली के समय कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) माह में मनाया जाता है जिसे कार्तिक छठ या बड़ी छठ पूजा कहा जाता है | यह चार दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है |
लोकआस्था व पवित्रता का विशेष ख्याल रखा जाने वाला यह पर्व दीपावली के चौथे दिन व भैयादूज के तीसरे दिन से यह छठ पर्व आरम्भ होता है | पहले दिन नहाय-खाय होता है उस दिन अरवा चावल व बिना प्याज़, लहसन के सेंधा नमक की प्रयोग में बनी कद्दू/लोकी/सजमाइन की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है | दूसरे दिन से सुबह के अर्घ्य तक छठ वर्तियों का उपवास आरम्भ होता है और दूसरे ही दिन शाम को खीर पूरी प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है जिसे खरना कहा जाता है | तीसरे दिन जल में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानि कच्ची दूध अर्पण करते है | और चौथे दिन भी जल में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते है | सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्युषा है | छठ पर्व में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त रूप से आराधना होती है | दीपावली के छठे दिन सायंकल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्युषा) व सातवे दिन प्रातः काल में सूर्य की पहली किरण (उषा) को अर्घ्य देकर नमन किया जाता है और इसके बाद वर्त की पारण की प्रक्रिया समाप्त होती है | ऐसा माना जाता है कि छठ पर्व ही ऐसा एक पर्व है जिसमे हम आने वाले कल की बेहतर के लिए ढ़लते हुए सूर्य की भी पूजा/प्रार्थना करते है |
छठवर्ती घर-परिवार में सुख शांति व संतान की लम्बी आयु के लिए वर्त रखती है | ये एक मात्र ही बिहार या पूरे भारत का ऐसा पर्व है जों वैदिक काल से चली आ रहीं है और बिहार की परंपरा बन चुकी है जिसका वर्णन महाभारत आदि में भी मिलता है | भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में गन्ने, केले का पेड़ आदि का प्रयोग कर एक घाट बनाया जाता है जहां बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी व गाय के गोबर से बने दीप व अन्य बर्तन, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की समाज बीच भरपूर मिठास का प्रसार कर पारिवारिक व सामाजिक एकता की मिसाल पेश की जाती है |
#सामा_चकेवा:- छठ महापर्व के प्रात:कालीन अर्घ्य के बाद मिथिलांचल के प्रसिद्ध पर्व सामा-चकेवा की शुरुआत होती हैं | यह लोकपर्व रक्षाबंधन एवं भाईदूज के बाद तीसरा ऐसा पर्व हैं जिसे भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है | इसमें बहनें सात दिनों तक रोज सामा-चकेवा, चुगला, पक्षी आदि की छोटे-छोटे मिट्टी की मूर्ति बनाकर उन्हें पूजती हैं | हर दिन गीत-नाद होता है | इसे खासतौर पर बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है | इसमें सामा स्त्री (बहन) हैं तो चकेवा पुरुष (भाई) हैं | पौराणिक कथा अनुसार अपनी बहन सामा को पक्षी से मनुष्य रूप में लाने के लिए चकेवा ने तपस्या करके सामा को पक्षी रूप से पुन: मनुष्य रूप में लाया | अपने भाई के समर्पण व त्याग देखकर सामा द्रवित हो गई, और मान्यता के अनुसार उसी की याद में तब से बहनें अपनी भाइयों के लिए यह पर्व मनाती आ रही हैं | सामा-चकेबा यानि भाई-बहन के इस कथा संसार में एक चरित्र है चुगला | जैसा कि नाम से स्पष्ट है, वह चुगली करता है, झूठी बातें फैलाता है | उसी के चलते सामा को कठोर श्राप झेलना पड़ा | इसलिए इस त्योहार में चुगले का मुंह काला किया जाता है |
प्रदूषण और स्वास्थ्य
आज प्रदूषण किसी ना किसी रूप में हम मनुष्यों के दैनिक जीवन सहित सारे सजीव प्राणियों का हिस्सा बन चूका हैं | हमारे चारो ओर के वातावरण को पर्यावरण कहते हैं | पर्यावरण शब्द का निर्माण परि और आवरण शब्द से मिलकर बना हैं, जहां परि का अर्थ हैं जों हमारे आस-पास चारो ओर हैं | और आवरण का अर्थ हैं जों चीजे हमें चारो ओर से घेरे हुए हैं | पर्यावरण के तीन मुख्य तत्व हैं – 1. जैव तत्व (पशु, पक्षी, पेड़-पौधे आदि सारी सजीव चीजे), 2. अजैव तत्व (वायुमंडल, स्थलमंडल, जलमंडल), 3. मौसम विषयक तत्व (प्रकाश, वर्षा, हवा, तापमान आदि) | हमारे चारो ओर के पर्यावरण में मनुष्यों द्वारा हस्तक्षेप के कारण प्रदूषण दिनों दिन बढ़ता जा रहा हैं | 21वीं सदी में इसका हानिकारक प्रभाव बड़े पैमाने पर महसूस किया जा रहा है | प्रदूषण का सीधा अर्थ हैं वातावरण में हवा, पानी, मिट्टी आदि का प्रदूषक तत्वों (आवंाछित द्रव्यों) से दूषित होना | अर्थात जीवमण्डल के वायुमंडल, जलमण्डल, एवं स्थलमंडल का प्रदूषित होना | प्रदूषण के कारण आज कई वनस्पतियां और जीव-जंतु या तो विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्त होने की कगार पर हैं | हमारी तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, अनियंत्रित नगरीकरण व ओद्योगिकीकरण, पेड़-पौधे (वनो) का अंधाधुंध विनाश, असंतुलित रासायनिक खादो एवं कीटनाशक रासायनो का अधिक प्रयोग, अत्याधुनिक जीवन शैली प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा हैं | प्रदूषण के द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रभावों के कारण मनुष्यों के लिए छोटी बीमारियों से लेकर मनुष्य की अस्तित्व संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं | प्रदूषण के प्रकार :- प्रदूषण मुख्य रूप से 4 प्रकार के होते हैं, जिन्हे वायु प्रदूषण (Air Pollution), जल प्रदूषण (Water Pollution), ध्वनि प्रदूषण (Pollution Essay), मृदा प्रदूषण (Soil Pollution) के रूप में जाना जाता है | 1. वायु प्रदूषण – धरातल से लगभग 1600 किलोमीटर ऊपर तक पृथ्वी के चारो ओर लगभग सेकड़ो किलोमीटर तक मोटाई में लपेटने वाले गैसिय अावरण को वायुमंडल कहते हैं, जों गुरुतवाकर्षण शक्ति से जुड़ा हुआ हैं | जब वातावरण (वायुमंडल) का शुद्ध हवा किसी विशेली गैस, धुएँ-धुल आदि के कारण प्रदूषित होती हैं तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं |
किसी भी चीज के जलाने पर, कारखानों और उद्योगों में उप-उत्पाद के रूप में जहरीले गैस उत्पादित होती हैं, प्लास्टिक जैसे जहरीले पदार्थों को खुले में जलाने से, रेफ्रीजरशन उद्योग में उपयोग किए जाने वाले सीएफ़सी से वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी होती है |
भारत में सड़कों पर वाहनों की संख्या में वृद्धि देखी गई है | ये सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को फैलाने के लिए भी जिम्मेदार हैं |इसके अलावा हवा में सीसा, जींक, गंधक, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड आदि गैसें पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा को कम करने के लिए जिम्मेदार हैं | वायु प्रदूषण के प्रभाव – सांस लेने की समस्याएं, श्वसन रोग, कई प्रकार के कैंसर, फेफड़े का रोग, हृदय रोग, सिर चकराना, चिड़चिड़ा होना, आँखों में जलन आदि जैसी बीमारियाँ तेजी से पनप रही हैं | 2. जल प्रदूषण – पृथ्वी अपनी तीन भाग पानी से घिरी हुई हैं और पृथ्वी पर शुद्ध जल की उपलब्धता मात्र 2 / 3% हैं |
जल प्रदूषण आज मनुष्यों के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक है | सीवेज अपशिष्ट, उद्योगों या कारखानों आदि के कचरे, अन्य कूड़ा, मल, जीव के शब सीधे नहरों, नदियों और समुद्रों जैसे जल निकायों में डाला जा रहा है | पेट्रोल, डीज़ल आदि अन्य कई तरल पदार्थ भी किसी ना किसी माध्यम से जल में पहुंचकर जल को प्रदूषित कर रहे हैं | कृषि का अत्यधिक पैदावार के उपयोग के लिए रसायन से भी पानी प्रदूषित हो रहीं हैं | नदियों का 70% पानी प्रदूषित हो चुकी हैं | इसके परिणामस्वरूप समुद्री जीव जंतुओं के आवास का नुकसान हो रहा है और जल निकायों में घुली ऑक्सीजन का स्तर भी घट रहा है |
जल प्रदूषण से प्रभाव – पीने योग्य पानी की कमी जल प्रदूषण का एक बड़ा कुप्रभाव है | दूषित पानी पीने से हैजा, डायरिया, पेचिश, पीलिया, आदि रोग होने का खतरा रहता है | गंदे जल से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में भी रुकावट आने लगती हैं जिससे पौधे मरने लगते हैं और पौधों पर आश्रित जलीय जीव भी कुपोषित होने लगती हैं | 3. ध्वनि (शोर)प्रदूषण – कोई भी ध्वनि जब मानसिक क्रियाओ में विघ्न उतपन्न करने लगती हैं तो शोर कहलाती हैं | समानतः 50 से 60 डेसिबल का शोर सहनीय होता हैं |वायु प्रदूषण में योगदान देने के अलावा, भारतीय सड़कों पर बड़ी संख्या में मौजूद वाहन, ध्वनि प्रदूषण में भी भरपूर योगदान देती हैं | इसके अलावा बिजली की कड़क, बादलो की गड़गड़ाहट, कारखानों की मशीने, लाउडस्पीकर, नारेबाजी, डी. जे. आदि ध्वनि प्रदूषण के श्रोत हैं | ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव – यह लोगों में चिंता, तनाव, बहरापन, उच्च रक्तचाप, अनिंद्रा, चिरचिरापन, हृदयरोग जैसे संबंधित मुद्दों का कारण बनता है | 4. भूमि (मृदा)प्रदूषण – किसी भी कारण से भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता खत्म हो वो भू-प्रदूषण कहलाता हैं | भारतीय आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है | इस काम के लिए, किसान बहुत सारे शाकनाशी, उर्वरक, कवकनाशी, कीटनाशक और अन्य समान रासायनिक यौगिकों का अनाज की अधिक पैदावार के लिए उपयोग करते हैं | इनके इस्तेमाल से मिट्टी दूषित होती है और इससे मिट्टी आगे फसल उगाने लायक नहीं रह जाती हैं | इसके अलावा घरेलू अपशिष्ट, नगर पालिका अपशिष्ट, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपशिष्ट, मृदा अपर्दन, मृदा खनन, अम्ल वर्षा आदि भी भूमि प्रदूषण को बढ़ावा देती हैं | ये सभी कारक मिट्टी को विषाक्त बनाने के लिए जिम्मेदार हैं | मृदा प्रदूषण का सबसे बड़ा प्रभाव हैं, शुद्ध अनाजो की उत्पाद में कमी होना | ये चार प्रमुख प्रकार के प्रदूषण हैं, जीवनशैली में बदलाव के कारण कई अन्य प्रकार के प्रदूषण भी देखे गए हैं जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक कचड़ा, रेडीएशन, रेडियोधर्मी प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण आदि | हम परमाणु युग में जी रहे हैं |इससे पृथ्वी के वातावरण में रेडियोधर्मी पदार्थों की उपस्थिति में वृद्धि हुई है | इसे रेडियोधर्मी प्रदूषण के रूप में जाना जाता है | हमारे चहुमुखी वातावरण में प्राणवायु (ऑक्सीजन) 21% हैं, नाइट्रोजन 78% हैं, कार्बनडाइऑक्साइड (CO2) 0.2% – 0.3% हैं | और इसी CO2 के बढ़ने से वैश्विक तापन में बढ़ोतरी होती हैं जिस वजह से हिमखंड पिघलने लगता हैं और जलवायु परिवर्तन आदि होने लगता हैं | ओजोन परत – वातावरण में फ्रिज, एसी आदि से निकलने वाली गैस फ़िरोन व क्लोरोफ़्लूरोकार्बन से भी प्रदूषण फैलता हैं जों ओजोन परत को प्रभावित करती हैं | ओजोन परत वायुमंडल में उपलब्ध एक ऐसी गैस की परत हैं जों सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणे को अवशोषित करती हैं | ओजोन परत में क्षरण के कारण सूर्य की किरण से निकलने वाली तापमान के प्रभाव से आंख में जलन, धुंधलापन, लू, कालापान, चर्मरोग आदि होने लगता हैं | प्रोद्योगिकी – प्रौद्योगिकी हमारी नई डिजिटल युग की जीवन रेखा है |
प्रौद्योगिकी का रीढ़ की हड्डी की तरह उपयोग किया जा रहा हैं | प्रौद्योगिकी हमारे दैनिक जीवन में छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक प्रवेश कर चुकी है | आज हम प्रौद्योगिकी के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते | चाहे वह खरीदारी हो, स्वचालित यंत्र हो, आईटी, चिकित्सा, अंतरिक्ष, शिक्षा, संचार आदि किसी के भी बारे में हो, हम आसानी से इस सभी में प्रौद्योगिकी की उपस्थिति का पता लगा सकते हैं | प्रौद्योगिकी के सकारात्मक के साथ नकारात्मक पहलु भी हैं, जैसे कि – ये हमें आलसी और बीमार भी बना रहे हैं, टेक्नोलॉजी की लत (इस पर निर्भर होना), याद्दाशत कम होना, अकेलापन और अवसाद , समय की बरबादी, खराब पॉश्चर, बेरोजगारी, गोपनीयता और असुरक्षा, आदि | प्रदूषण से बचाव के कुछ उपाय – वाहनों का प्रयोग सीमित करना, अपने आस-पास साफ-सफाई रखना , रिसाइकल और पुन: उपयोग , अधिक से अधिक पेड़ लगाना तथा उसकी कटाई पर रोक लगाना, स्वस्थ खान-पान, योगा-व्यायाम करना,
निबंध
जम्मू
संक्षिप्त लेख संख्या :- चौदह, जम्मू और कश्मीर विशेष ! भारत ही नहीं समुच्चे पृथ्वी की स्वर्ग मानी जाने वाली जम्मू और कश्मीर में हिमालय की उंची चोटियां, नदियां, हिमनद/हिमखंड, झील, कश्मीर की घाटी,सदाबहार वन इत्यादि कई रमणीक प्राकृतिक सौन्दर्य का भंडार रूप जम्मू और कश्मीर लोगों को काफ़ी लुभाती है|यहां की ठंडी हसीन वादियों में अक्टूबर से मार्च तक बर्फ की वर्षा (हिमपात) का दृश्य पर्यटको को काफ़ी मनमोहती है|कश्मीर सफ़ेद बर्फ से ढका हुआ दिखाई पड़ता है जों मानो मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है | कश्मीर कश्मीरी शाल,केसर, सेब व सूखे फल के लिए भी काफ़ी प्रसिद्ध है | यहां कटरा के त्रिकुट पर्वत पर स्थित माता रानी वैष्णो देवी तथा अमरनाथ में हर वर्ष सावन महीने में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग / स्वयंभू हिमलिंग के निर्मित होने का दर्शन करने हेतु हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक स्थल का केंद्र है | जम्मू कश्मीर की राजधानी मौसम आधारित है, मई से अक्टूबर गर्मियों में श्रीनगर और नवंबर से अप्रैल सर्दियों में जम्मू होती है | समय था मार्च 2015 का जब पहली बार एक स्कीइंग कैंप हेतु इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्कीइंग एंड माउंटेंनियरिंग – गुलमर्ग के लिए जम्मू और कश्मीर के प्रांगण में कदम रखा था | छुकछुक गाड़ी सर्वप्रथम हमें जम्मू पहुंचाई, फिर वहां से बस द्वारा चारो दिशाओ को निहारते हुए हम बारामूला जिले में फूलो के प्रदेश के नाम से मशहूर गुलमर्ग/गौरीमर्ग पहुँचे | बर्फ के गोद में स्की के साथ थोड़ा धुन छेड़ते हुए, सभी ट्रेनी आपस में मस्ती करते हुए, अंत में अलग-अलग राज्यों से आए ट्रेनी कुछ नाच गान के साथ अपने-अपने तरीको से कभी ना भूलने वाली कई हसीन पलो को यादों में कैद कर हम सभी एक भाग्यशाली ट्रेनी के रूप में वापिस हो लिए थे| क्योंकि जम्मू और कश्मीर में लोगों का जीवन सुरक्षित नहीं रहता था और आए दिन वहां पर कभी भी किसी भी प्रकार का हमला होते रहता था | भारत के आजादी के बाद से जम्मू और कश्मीर का हाल एक राज्य के रूप में और 5 अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर में लागू अनुच्छेद 370 व 35अ को निरस्त करने के बाद 31 अक्टूबर से एक केंद्रशासित प्रदेश के रूप में बहुत बड़ा अंतर दिखने को मिल रहा है (अनुच्छेद 370 व 35A की विस्तृत जानकारी को गूगल/यूट्यूब पर पढ़ा सुना जा सकता है)| वर्ष 1989 में कश्मीर में घटी बहुत ही मार्मिक नरसंहार को ‘द कश्मीर फाइल्स’ चलचित्र से बेहतर समझा जा सकता है कि कैसे लोगों को कीड़े मकोरे की तरह मारा गया और साथ ही कैसे वहां की मूलनिवासी लगभग 4 से 5 लाख कश्मीरी पंडितो को पलायन करना पड़ा | वर्तमान समय में जम्मू और कश्मीर में केंद्र शासित सरकार द्वारा वर्ष 2022 से हर वर्ष 23 सितम्बर को यानी कि महाराजा हरि सिंह की जयंती पर जम्मू और कश्मीर में सरकारी छुट्टी की घोषणा से स्थानीय लोगों बीच हर्ष का वातावरण बना हुआ है | भारत के स्वतंत्रता के समय महाराज हरि सिंह डोगरा यहां के शासक थे, जों अपने प्रदेश को स्वतंत्र रख़ना चाहते थे मगर पाकिस्तान के हमले के कारण जम्मू और कश्मीर को भारत में विलय कर दिया गया | मगर जब भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना पर हमला करते हुए कश्मीर के इलाकों को मुक्त कराते आगे बढ़ रहीं थी कि भारत की तत्कालीन केंद्र सरकार के भारतीय सेना की सलाह के विपरीत ढीलापन रवैया के कारण पाकिस्तान ने घुसपैठ करके कश्मीर के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया जों पाकिस्तान औक्यूपाइड कश्मीर कहलाता है | साथ ही 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद कश्मीर के कुछ हिस्सों पर चीन ने भी कब्जा कर लिया जिसे अक्साई चीन कहा जाता है | पाकिस्तान द्वारा समुच्चे कश्मीर पर अपना अधिकार ज़माने के वजह से आए दिन कश्मीर में हमले होते रहते थे और कश्मीर में संघर्ष की जड़ में इस्लाम की कट्टरपंथी सोच ही है जों भारत की आजादी के समय से ही धीरे-धीरे 1980 के दशक के अंत में कट्टरता सामने आई और उसी समय जिहाद शब्द को हवा दी गई |इस बात से भी नहीं नाकारा जा सकता कि कश्मीर सहित समुच्चे भारत में इस्लाम की कट्टरपंथी सोच या जिहाद को हवा पानी देने का कार्य में अन्य विदेशी ताकतों का हाथ ना हो | हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार की पहल से जम्मू कश्मीर की हालत धीरे-धीरे पहले से बेहतर हो रहीं जों देश हित के लिए काबिले तारीफ है…
भोजन और स्वास्थ्य!
संक्षिप्त लेख संख्या :- तेरह, भोजन और स्वास्थ्य !
भोजन वह बुनियादी सामग्री है जिसकी पृथ्वी पर बसे पूरे जीवसृष्टी के लिए प्रमुख अावश्यकताओं में से एक है|भोजन मानव जीवन का वह प्रमुख घटक है जिसकी शारीरिक व मानसिक विकास के लिए अति आवश्यकता होती है|स्वस्थ व पोष्टीक आहार हमें स्वस्थ मन प्रदान करता है, स्वस्थ मन – स्वस्थ तन और स्वस्थ तन – स्वस्थ जीवन प्रदान करता है | विज्ञान के अनुसार मानव तन को स्वस्थ रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जैसे कि 1. शक्तिदायक भोजन – कार्बोहाइड्रेट तथा वसा युक्त भोजन, 2. शरीर निर्माण यानि प्रोटीन युक्त भोजन, 3. शरीर को संरक्षण देने वाला भोजन यानि कि खनिज, कैल्शियम व विटामिन युक्त भोजन (विटामिन के कई प्रकार होते है, जैसे – विटामिन ‘C’ इम्युनिटी बुस्ट का कार्य करती है जों साईट्रिक फ़ूड नींबू, संतरा, दही, आवला आदि में पायी जाती है, विटामिन ‘D’ (सूर्य की रौशनी ) जों हमारी दांतो और हड्डियों को मजबूती प्रदान करती है, विटामिन ‘E’, ‘K’ आदि )| आमतौर पर सभी प्रकार के फल, हरी व पत्तेदार सब्जियां, अनाज (चावल, चपाती ), दालें, दूध और दूध से बनी भोज्य पदार्थ एक अच्छे खाद्य पदार्थ की श्रेणी में आती है, जिससे कि मानव शरीर की शारीरिक व मानसिक विकास की महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती है |
महान ग्रंथ गीता के अनुसार भोजन को तीन भागो में बाटा गया है :-
1. राजसिक भोजन – जों हमारे मन को चंचल बनाता है, उत्तेजित करता है | जैसे – अत्यधिक तेलिय पदार्थ (ऑयली फ़ूड), मिर्च माशालेदार भोजन, तेज नमक, सभी प्रकार के फ़ास्ट/जंक फ़ूड, कोल्ड ड्रिंक्स, केक-पेस्ट्री, चाय-कॉफ़ी, आदि |
ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार के अधिक व बराबर भोजन करने वाले लोगों में धैर्य (पेशेंस) की कमी रहती है और शरीर बीमारी के चपेट में जल्द आ जाती है |
2. तामसिक भोजन – यह हमारे मन के अंदर आलस, क्रोध, मन-मस्तिष्क-शरीर में शून्य की स्थिति तथा बीमारी को बढ़ावा देती है | जैसे – शराब, सिगरेट कोकीन, चरस, गांजा, भाँग, अफीम, तम्बाकू (सभी प्रकार के मादक पदार्थ ), मांसाहारी भोजन , अधिक देर का बना हुआ भोजन, आदि |
वास्तव में किसी भी प्रकार के भोजन, ख़ासकर राजसिक/तामसिक भोजन का अत्यधिक सेवन करने से हमारे मन-मस्तिष्क पर तामसिक प्रभाव ही छोड़ता है |
3. सात्विक भोजन – इस प्रकार के भोजन मन को शांति प्रदान करता है | हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है | हमें धैर्यवान व बलवान बनाता है | यह हमारे तन, मन और जीवन को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाती है | जैसे – सभी प्रकार के फल-सब्जी, दूध, दही व दूध से बने खाद्य पदार्थ , दाल, चावल, रोटी, शहद, ऐसा भोजन जिसमें तेल-मशाला-बटर की कमी हो, आदि | ये सभी हल्के भोज्य पदार्थ कहलाते है |
अब हम बात करते है कि हमारी संस्कृति, रीति -रिवाज़ हमें कैसे सकारात्मक रखती है, हमारे तन मन को स्वस्थ रखती है :- जब हम कोई पर्व मनाते है तो राजसिक और तामसिक भोजन से दूरी बनाते है, साफ सफाई का विशेष ध्यान रखते है|हम उपवास भी करते है, जिसपर मेडिकल साइंस भी कहती है कि हमें एक दिन की साप्ताहिक उपवास भी करनी चाहिए, जिससे शरीर की घर्षण से आतंरिक विकार मल मूत्र के द्वारा बाहर आ जाए या फिर हम उसके लिए प्रतिदिन योगा/व्यायाम करते है|इन सब चीजों से हमारा शरीर हल्का रहता है, हम नकारात्मक विचारों से दूर रह पाते है|भारत त्योहारों का देश है, त्यौहार कठिनाई, पीड़ा तथा तनाव को भुलाने का साधन भी होता है|हर पर्व में कुछ नियम, बंधन होती है, जिसे हर कोई उस बंधनों की रक्षा कर अर्थात अपनी संस्कृति का पालन कर अनुशासित रूप में मनाते है, जहां पारिवारिक एकतामें भी आपसी सामंजस्य बना रहता है|और हम अनुशासित व सकारात्मक जीवन व्यतीत कर पाते है|त्योहारों से एक नई आशा जगती है, कुछ अच्छा होने का उम्मीद बना रहता है| जों भी चीज हमारे पास एक ही है और जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे साथ होगी तो उसका ख्याल विशेष रूप से रखना ही होगा|स्वास्थ्य को लेकर खुद को स्वार्थी बनाना होगा|40-45 वर्ष तक खान-पान, व्यायाम आदि का ख्याल ना रखने का पता नहीं चलता है, उसके बाद हम धीरे-धीरे आम शारीरिक समस्या का शिकार होने लगते है और डॉक्टर, हॉस्पिटल का चक्कर लगाने लगते है|40-45 वर्ष तक हम जितना मेहनत करते है, खुद को तपाते है तो उसका क्या अर्थ ? अगर हम बीमार पड़ते है तो हमारे साथ घर के अन्य लोगों की भी भागीदारी हो जाती है|और मध्यम वर्गीय परिवार अपनी ही तरक्की पर बाधा पहुंचाने का कार्य करती है| हमारे प्रतिदिन की खान-पान में पानी का भी विशेष महत्व है|एक स्वस्थ और व्यसक व्यक्ति को 24 घंटे में कम से कम 3-4 लीटर पानी पीना चाहिए, इसके अलावा लोगों की शारीरिक गतिविधि पर निर्भर करता है|सुबह -सुबह खाली पेट पानी पीनी चाहिए|खाना खाने वक्त कम से कम पानी पीनी चाहिए और भोजन ग्रहण करने के 30 से 45 मिनट बाद ही पानी पीनी चाहिए| आज बाजार में अधिकांश भोजन सामग्री पर केमिकल का प्रभाव रहता है |हम जों भी खाते पीते है, उस पर अब रासायनिक खाद्य पदार्थ का अधिक मिश्रण होने लगा है|हमें विदेशी खान-पान, भोजन सामग्री का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए| हम कुछ भी रेडीमेड भोजन सामग्री खरीदते है तो हमें रेडीमेड वस्तु पर अंकित एक्सपायरी डेट और बेस्ट बिफोर डेट में अंतर पता होना चाहिए -किसी भी भोजन सामग्री पर अंकित एक्सपायरी डेट यह बतलाती है कि मैन्युफैक्चरिंग डेट से एक्सपायरी डेट तक के बीच भोजन की क्वालिटी/फ्लेवर में ज्यादा बदलाव नहीं होती है, जैसे – बिस्किट, टॉफ़ी, कोल्डड्रिंक आदि|वहीं किसी भी भोजन सामग्री पर अंकित बेस्ट बिफोर डेट यह दर्शाती है कि मैन्युफैक्चरिंग डेट से बेस्ट बिफोर डेट तक पहुंचने में धीरे-धीरे क्वालिटी/फ्लेवर/स्वाद में कमी आते जाती है, जैसे मिठाई, ब्रेड, केक/पेस्ट्री आदि|किसी भी खान-पान के पदार्थ पर अंकित बार कोड यह दर्शाती है कि इसे FSSAI (FOOD SAFETY & STANDARD AUTHORITY OF INDIA) द्वारा लाइसेंस प्रदान की गई है, इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं है|
कोरोना काल ने हमें बतलाया कि जिसकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी वो लम्बे समय तक जीवित रह पाएगा, अगर वो किसी प्रकार के राजनीति, हिंसा, ईर्ष्या, नेपोटिज्म, आपदा आदि का शिकार ना हुआ तो|काफ़ी शतर्कता के बाद भी कभी -कभी हम बीमार हो जाते है या हो सकते है, इसका मतलब यह नहीं कि हम जितना कोशिश कर सकते है उतना कोशिश करे ही ना| इस दुनियां में ऐसे कई सारे इंसान है, जिनको दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता है|हम मनुष्य को छोड़कर बाकि अन्य कई जीव प्राणी भी भोजन के लिए तरसती है, लड़ती रहती है|इसलिए हमें भोजन के महत्व को समझते हुए भोजन का सम्मान करना चाहिए, भोजन उतना ही लेना/खाना चाहिए जितने से अपना पेट भर जाए|हमें किसानो की बेज्जती नहीं करनी चाहिए, भोजन की बर्बादी नहीं करनी चाहिए… ✍️ -बाबुल
हिंदी
हिंदी ‘हिंदुस्तानी भाषा’ जो मुख्य रूप से संस्कृत से ही लिए गए शब्दों का रूपांतर है |हाँ जी हाँ यह वही हिंदुस्तानी भाषा है जिसे आजादी की लड़ाई लड़ रहे बहुत सारे क्रान्तिकारियो ने समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने के लिए प्रयोग किए थे और सन् 1918 में गाँधी जी ने जनमानस की भाषा बता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की प्रयास भी किए थे मगर आज तक यह हमारी राष्ट्रभाषा की जगह नही ले पाई है| स्वतंत्रता के संघर्ष के समय समस्त स्वतंत्रता सेनानियों ने चाहे वो उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भारतीय,उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा को ही,अपने प्रचार का माध्यम बनाया था मगर आज वही हिंदुस्तानी भाषा अपने ही देश में एक अनजाने व्यक्ति के समान अपना अस्तित्व खोज रही है |हम अपनी भाषा के प्रयोग से शर्माने से लगे है जिसे देखो वो हिंदी से दूर भागने का प्रयास करते रहते है |हिंदी का स्थान निश्चय ही धीरे-धीरे अंग्रेजी लेती जा रही है|अंग्रेजी निश्चय ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क साधने का सर्वोत्तम साधन बन चुकी है | परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है की जहाँ कही भी इसकी आवश्यक्ता नही है,फिर वहां भी अंग्रेजी को ही महत्व क्यों दिया जाता है ?अहिन्दी भाषियों बीच संचार को सरल करने के लिए अंग्रेजी भाषा जरूरी है,अपनों बीच अंग्रेजियत दिखाने के लिए तो नही(गुस्ताखी माफ़)| हम जो है सो है इसे प्रमाणित करने की आवश्यक्ता क्या ? हिंदी बोलना व लिखना यह तो हमारी दुनिया बीच गोपनीयता हो गई जो जरूरी भी है|पहले हम अंग्रेजो के गुलाम थे अब अंग्रेजी भाषा के होते जा रहे |आज तक ठीक है मगर आने वाले कल का क्या ? किसी कपड़े की दुकान में जा बोले की हमे कपास में कपड़े दिखाए शायद ही वो समझ पाए मगर कॉटन बोलेंगे तो तुरंत समझ जायेंगे|
कितने सारे विदेशी समानो पर हिंदुस्तान को सूचित करने के लिए हिंदी में सूचना दिया जाता है ?और हमारे बाजार में चाइना के बहुत सारे वस्तु मिलते है जिसमे बहुत कम ही वस्तु है जिसपे अंग्रेजी में भी कुछ सूचना लिखा होता है|और हमारे यहां माँ माँ से मोम हो गई और पिता डैड हो गए|जगह-जगह देखो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने के लिए वर्ग लगाये जा रहे मगर कोई फर्राटेदार हिंदी बोलने के लिए कहा वर्ग लगा रहे जिससे हम शुद्ध-शुद्ध हिंदी बोलना और लिखना भी जाने |मगर आज के समय में बहुत सारे हिंदी अंग्रेजी बोलना अपनी प्रतिष्ठा समझते है |दरअसल शायद गलती उनकी भी नही है|वैश्वीकरण के इस युग में रोजगार, शिक्षा,प्रशिक्षण हर क्षेत्र में भाषा के नाम पर अंग्रेजी को ही महत्व दिया जाता है |आलम तो यह हो गया है कि बच्चे अंग्रेजी उच्चारण में बहुत निपुण बनने के प्रयास के कारण हिंदी में पीछे होते जा रहे और साथ ही बेरोजगार भी | वो तो कुछ हिंदी साहित्यकार, हिंदी न्यूज़ चैनल या कुछ हिंदी लेखक है जो हिंदुस्तानी भाषा को कायम रखने की प्रयास कर रहे अन्यथा ?
हम हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस व 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में हिंदी भाषी को हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए मनाते है जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिंदी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सके |लेकिन हिंदी तो अपने ही घर में दासी के रूप में रह रही|इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारतीय योग को 21 जून 2015 को 177 देशो का समर्थन मिला लेकिन क्या हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए 129 देशो का समर्थन नही जुटाया जा सकता ?
हिंदी है हम और हमे इसपे गर्व होना चाहिए ना कि शर्म|हिंदी से ही हमारी पहचान है और हिंदी दिवस के दिन भी कई लोगो को सोशल साइट्स पे ‘हिंदी में बोलो’ जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ता है |भला कोई भी अपनी संस्कृति व मूल भाषा को भुला अस्तित्व में कैसे रह सकता है ? सुनो-सुनो कैसे हिंदी है हम ?
तनाव
तनाव, उदासीनता, डिप्रेशन!
तनाव, जो कुछ समय पहले तक एक आम विषयमात्र था, आज एक आम बीमारी हो गई है, विशेषकर शहरी इलाकों में रहने वाले लोगो बीच | विचारको का मानना है कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता और विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों का एक दुष्परिणाम तनाव रहा है जो कि आधुनिकता की एक व्यापक महामारी बन गई है |
मनुष्य तनावग्रस्त तब होता है जब वह मनोवैज्ञानिक संतुलन खो बैठता है | और मनुष्य अपना मनोवैज्ञानिक संतुलन तब खोता है जब वह जैविकघड़ी की विकार (डिसऑर्डर ऑफ़ बायोलॉजिकल क्लॉक) का शिकार हो जाता है |और तनाव के शिकार होते ही मनुष्य के मस्तिष्क में ख़ुशी प्रदान करने वाली फील गुड हार्मोन #डोपामिन का क्षय होने लगता है, डोपामिन का स्तर लगातार कम होते चला जाता है और मनुष्य उदास रहने लगता है |
तनावग्रस्त होने का मुख्य दस कारण है:-
1.घूम्रपान, 2.नींद पूरी ना करना, 3.खान पान का समय पर और सही ना होना, 4.मुश्किलों से घबरा जाना, 5.किसी दवाब में लगातार रहना, 6.विभिन्न प्रदुषण, 7.व्ययाम ना करना, 8.किसी प्रकार की शंका या चिंता में जीना,9.इच्छा पूर्ण होते ना देखना, 10.हर छन असंतोष में जीना |
हालांकि उपरोक्त की गई बातो में बिंदु संख्या चार व पाँच के नकारात्मक के संग-संग सकारात्मक पहलू भी है जैसे कि एक सफल व्यक्ति की सकारात्मक सोच कहती है कि जीवन में आए मुश्किलों ने हमें यहाँ तक पहुंचा दिया और असफल व्यक्ति भी यही बात कहता है जो नकारात्मक सोच दर्शाती है | तो दवाब में कई लोग बेहतर तरीके से कार्य को पूर्ण कर लेते है कई लोग नहीं कर पाते है |
तनावरहित जीवन के ये लक्षण क्रमशः हमारे व्यवहार में दिखने लगते है :-
उत्साह में कमी, डर कर जीना, किसी से बात चित ना करना, शंका में रहना, आत्मविश्वास खोना, लोगो से दूरी बना लेना (अकेले रहना),सही गलत बीच निर्णय ना ले पाना,निर्णय लेने में संकोची होना, हर समय चिड़चिड़ा रहना, बात-बात पर गुस्सा हो जाना, कभी-कभी अपने आप धड़कन की गति का बढ़ जाना, पाचनशक्ति का मंद होना, आदि |
मनुष्यों के जीवन पर वो जो भी कार्य करता है उसका भी प्रभाव पड़ता ही है तो किसी भी कार्य को करने से पहले खुद से कुछ सवाल जवाब कर लेना चाहिए, जैसे कि :-
1.मैं उस कार्य में शामिल जोखिम उठाने की ि स्थति में हूँ या नहीं ?
2.उस कार्य को करते हुए मैं अपने जीवन को संतुलित रख पाउँगा या नहीं ?
3.उस कार्य को करने से भविष्य में प्रगति की क्या संभावनाएँ हैं ?
4.कार्य मेंरी रूचि का है या नहीं या कार्य में मेरी रूचि लम्बे समय तक रहेगी या नहीं ?
5.उस कार्य को करने के लिए जितनी क्षमता चाहिए,उतनी आत्मविश्वास अपने अंदर विकसित कर सकता हूँ या नहीं ?
6.वह कार्य स्वयं,परिवार, समाज व देश के लिए अच्छा है या नहीं ; या उस कार्य को करने से खुद को या किसी अन्य लोगो को कोई हानि तो नहीं ?
अतः तनाव में जीवन जीने के बहुत कारण है मगर तनाव से बचे रहने के बहुत ही सरल तरीके है :-
1.ध्यान, योगा (मैडिटेशन) करना |
2.रिश्तेदारों व मित्रो से बात-चित करते रहना |
3.वैसे चीजों की लत (आदत )ना लगाना जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो |
4.भविष्य के बदले वर्तमान में जीना |
5.अच्छे बुरे चीजों को अपनी डायरी में लिखना |
6.समय पर भोजन ग्रहण करना तथा सात घंटे की नींद पूर्ण करना |
7.अच्छे संगीत सुनना, कही घूमने जाना मगर अभी नहीं अभी कोरोना विषाणु से बचना है |
8.किसी शंका या चिंता में ना रहना |
9.जागरूक, धैर्यवान व उत्साही बने रहना |
10.हर नकारात्मक विचारों से दूरी बनाये रखना |
*मनोरंजन बिना तो जीवन संभव ही नहीं ¡!
*शारीरिक मजबूती संग मानसिक मजबूती का भी होना अति आवश्यकता ¡!
The Journey Begins
Thanks for joining me!
Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton
