हिंदी ‘हिंदुस्तानी भाषा’ जो मुख्य रूप से संस्कृत से ही लिए गए शब्दों का रूपांतर है |हाँ जी हाँ यह वही हिंदुस्तानी भाषा है जिसे आजादी की लड़ाई लड़ रहे बहुत सारे क्रान्तिकारियो ने समस्त राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने के लिए प्रयोग किए थे और सन् 1918 में गाँधी जी ने जनमानस की भाषा बता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की प्रयास भी किए थे मगर आज तक यह हमारी राष्ट्रभाषा की जगह नही ले पाई है| स्वतंत्रता के संघर्ष के समय समस्त स्वतंत्रता सेनानियों ने चाहे वो उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भारतीय,उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा को ही,अपने प्रचार का माध्यम बनाया था मगर आज वही हिंदुस्तानी भाषा अपने ही देश में एक अनजाने व्यक्ति के समान अपना अस्तित्व खोज रही है |हम अपनी भाषा के प्रयोग से शर्माने से लगे है जिसे देखो वो हिंदी से दूर भागने का प्रयास करते रहते है |हिंदी का स्थान निश्चय ही धीरे-धीरे अंग्रेजी लेती जा रही है|अंग्रेजी निश्चय ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क साधने का सर्वोत्तम साधन बन चुकी है | परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है की जहाँ कही भी इसकी आवश्यक्ता नही है,फिर वहां भी अंग्रेजी को ही महत्व क्यों दिया जाता है ?अहिन्दी भाषियों बीच संचार को सरल करने के लिए अंग्रेजी भाषा जरूरी है,अपनों बीच अंग्रेजियत दिखाने के लिए तो नही(गुस्ताखी माफ़)| हम जो है सो है इसे प्रमाणित करने की आवश्यक्ता क्या ? हिंदी बोलना व लिखना यह तो हमारी दुनिया बीच गोपनीयता हो गई जो जरूरी भी है|पहले हम अंग्रेजो के गुलाम थे अब अंग्रेजी भाषा के होते जा रहे |आज तक ठीक है मगर आने वाले कल का क्या ? किसी कपड़े की दुकान में जा बोले की हमे कपास में कपड़े दिखाए शायद ही वो समझ पाए मगर कॉटन बोलेंगे तो तुरंत समझ जायेंगे|
कितने सारे विदेशी समानो पर हिंदुस्तान को सूचित करने के लिए हिंदी में सूचना दिया जाता है ?और हमारे बाजार में चाइना के बहुत सारे वस्तु मिलते है जिसमे बहुत कम ही वस्तु है जिसपे अंग्रेजी में भी कुछ सूचना लिखा होता है|और हमारे यहां माँ माँ से मोम हो गई और पिता डैड हो गए|जगह-जगह देखो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने के लिए वर्ग लगाये जा रहे मगर कोई फर्राटेदार हिंदी बोलने के लिए कहा वर्ग लगा रहे जिससे हम शुद्ध-शुद्ध हिंदी बोलना और लिखना भी जाने |मगर आज के समय में बहुत सारे हिंदी अंग्रेजी बोलना अपनी प्रतिष्ठा समझते है |दरअसल शायद गलती उनकी भी नही है|वैश्वीकरण के इस युग में रोजगार, शिक्षा,प्रशिक्षण हर क्षेत्र में भाषा के नाम पर अंग्रेजी को ही महत्व दिया जाता है |आलम तो यह हो गया है कि बच्चे अंग्रेजी उच्चारण में बहुत निपुण बनने के प्रयास के कारण हिंदी में पीछे होते जा रहे और साथ ही बेरोजगार भी | वो तो कुछ हिंदी साहित्यकार, हिंदी न्यूज़ चैनल या कुछ हिंदी लेखक है जो हिंदुस्तानी भाषा को कायम रखने की प्रयास कर रहे अन्यथा ?
हम हर वर्ष 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस व 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में हिंदी भाषी को हिंदी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए मनाते है जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिंदी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सके |लेकिन हिंदी तो अपने ही घर में दासी के रूप में रह रही|इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारतीय योग को 21 जून 2015 को 177 देशो का समर्थन मिला लेकिन क्या हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए 129 देशो का समर्थन नही जुटाया जा सकता ?
हिंदी है हम और हमे इसपे गर्व होना चाहिए ना कि शर्म|हिंदी से ही हमारी पहचान है और हिंदी दिवस के दिन भी कई लोगो को सोशल साइट्स पे ‘हिंदी में बोलो’ जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ता है |भला कोई भी अपनी संस्कृति व मूल भाषा को भुला अस्तित्व में कैसे रह सकता है ? सुनो-सुनो कैसे हिंदी है हम ?