प्रदूषण और स्वास्थ्य

आज प्रदूषण किसी ना किसी रूप में हम मनुष्यों के दैनिक जीवन सहित सारे सजीव प्राणियों का हिस्सा बन चूका हैं | हमारे चारो ओर के वातावरण को पर्यावरण कहते हैं | पर्यावरण शब्द का निर्माण परि और आवरण शब्द से मिलकर बना हैं, जहां परि का अर्थ हैं जों हमारे आस-पास चारो ओर हैं | और आवरण का अर्थ हैं जों चीजे हमें चारो ओर से घेरे हुए हैं | पर्यावरण के तीन मुख्य तत्व हैं – 1. जैव तत्व (पशु, पक्षी, पेड़-पौधे आदि सारी सजीव चीजे), 2. अजैव तत्व (वायुमंडल, स्थलमंडल, जलमंडल), 3. मौसम विषयक तत्व (प्रकाश, वर्षा, हवा, तापमान आदि) | हमारे चारो ओर के पर्यावरण में मनुष्यों द्वारा हस्तक्षेप के कारण प्रदूषण दिनों दिन बढ़ता जा रहा हैं | 21वीं सदी में इसका हानिकारक प्रभाव बड़े पैमाने पर महसूस किया जा रहा है | प्रदूषण का सीधा अर्थ हैं वातावरण में हवा, पानी, मिट्टी आदि का प्रदूषक तत्वों (आवंाछित द्रव्यों) से दूषित होना | अर्थात जीवमण्डल के वायुमंडल, जलमण्डल, एवं स्थलमंडल का प्रदूषित होना | प्रदूषण के कारण आज कई वनस्पतियां और जीव-जंतु या तो विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्त होने की कगार पर हैं | हमारी तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, अनियंत्रित नगरीकरण व ओद्योगिकीकरण, पेड़-पौधे (वनो) का अंधाधुंध विनाश, असंतुलित रासायनिक खादो एवं कीटनाशक रासायनो का अधिक प्रयोग, अत्याधुनिक जीवन शैली प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा हैं | प्रदूषण के द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रभावों के कारण मनुष्यों के लिए छोटी बीमारियों से लेकर मनुष्य की अस्तित्व संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं | प्रदूषण के प्रकार :- प्रदूषण मुख्य रूप से 4 प्रकार के होते हैं, जिन्हे वायु प्रदूषण (Air Pollution), जल प्रदूषण (Water Pollution), ध्वनि प्रदूषण (Pollution Essay), मृदा प्रदूषण (Soil Pollution) के रूप में जाना जाता है |  1. वायु प्रदूषण – धरातल से लगभग 1600 किलोमीटर ऊपर तक पृथ्वी के चारो ओर लगभग सेकड़ो किलोमीटर तक मोटाई में लपेटने वाले गैसिय अावरण को वायुमंडल कहते हैं, जों गुरुतवाकर्षण शक्ति से जुड़ा हुआ हैं | जब वातावरण (वायुमंडल) का शुद्ध हवा किसी विशेली गैस, धुएँ-धुल आदि के कारण प्रदूषित होती हैं तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं |

किसी भी चीज के जलाने पर, कारखानों और उद्योगों में उप-उत्पाद के रूप में जहरीले गैस उत्पादित होती हैं, प्लास्टिक जैसे जहरीले पदार्थों को खुले में जलाने से, रेफ्रीजरशन उद्योग में उपयोग किए जाने वाले सीएफ़सी से वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी होती है |

भारत में सड़कों पर वाहनों की संख्या में वृद्धि देखी गई है | ये सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को फैलाने के लिए भी जिम्मेदार हैं |इसके अलावा हवा में सीसा, जींक, गंधक, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड आदि गैसें पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा को कम करने के लिए जिम्मेदार हैं | वायु प्रदूषण के प्रभाव – सांस लेने की समस्याएं, श्वसन रोग, कई प्रकार के कैंसर, फेफड़े का रोग, हृदय रोग, सिर चकराना, चिड़चिड़ा होना, आँखों में जलन आदि जैसी बीमारियाँ तेजी से पनप रही हैं | 2. जल प्रदूषण – पृथ्वी अपनी तीन भाग पानी से घिरी हुई हैं और पृथ्वी पर शुद्ध जल की उपलब्धता मात्र 2 / 3% हैं |

जल प्रदूषण आज मनुष्यों के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक है | सीवेज अपशिष्ट, उद्योगों या कारखानों आदि के कचरे, अन्य कूड़ा, मल, जीव के शब सीधे नहरों, नदियों और समुद्रों जैसे जल निकायों में डाला जा रहा है | पेट्रोल, डीज़ल आदि अन्य कई तरल पदार्थ भी किसी ना किसी माध्यम से जल में पहुंचकर जल को प्रदूषित कर रहे हैं | कृषि का अत्यधिक पैदावार के उपयोग के लिए रसायन से भी पानी प्रदूषित हो रहीं हैं | नदियों का 70% पानी प्रदूषित हो चुकी हैं | इसके परिणामस्वरूप समुद्री जीव जंतुओं के आवास का नुकसान हो रहा है और जल निकायों में घुली ऑक्सीजन का स्तर भी घट रहा है |

जल प्रदूषण से प्रभाव – पीने योग्य पानी की कमी जल प्रदूषण का एक बड़ा कुप्रभाव है | दूषित पानी पीने से हैजा, डायरिया, पेचिश, पीलिया, आदि रोग होने का खतरा रहता है | गंदे जल से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में भी रुकावट आने लगती हैं जिससे पौधे मरने लगते हैं और पौधों पर आश्रित जलीय जीव भी कुपोषित होने लगती हैं | 3. ध्वनि (शोर)प्रदूषण – कोई भी ध्वनि जब मानसिक क्रियाओ में विघ्न उतपन्न करने लगती हैं तो शोर कहलाती हैं | समानतः 50 से 60 डेसिबल का शोर सहनीय होता हैं |वायु प्रदूषण में योगदान देने के अलावा, भारतीय सड़कों पर बड़ी संख्या में मौजूद वाहन, ध्वनि प्रदूषण में भी भरपूर योगदान देती हैं | इसके अलावा बिजली की कड़क, बादलो की गड़गड़ाहट, कारखानों की मशीने, लाउडस्पीकर, नारेबाजी, डी. जे. आदि ध्वनि प्रदूषण के श्रोत हैं | ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव – यह लोगों में चिंता, तनाव, बहरापन, उच्च रक्तचाप, अनिंद्रा, चिरचिरापन, हृदयरोग जैसे संबंधित मुद्दों का कारण बनता है | 4. भूमि (मृदा)प्रदूषण – किसी भी कारण से भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता खत्म हो वो भू-प्रदूषण कहलाता हैं | भारतीय आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है | इस काम के लिए, किसान बहुत सारे शाकनाशी, उर्वरक, कवकनाशी, कीटनाशक और अन्य समान रासायनिक यौगिकों का अनाज की अधिक पैदावार के लिए उपयोग करते हैं | इनके इस्तेमाल से मिट्टी दूषित होती है और इससे मिट्टी आगे फसल उगाने लायक नहीं रह जाती हैं | इसके अलावा घरेलू अपशिष्ट, नगर पालिका अपशिष्ट, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपशिष्ट, मृदा अपर्दन, मृदा खनन, अम्ल वर्षा आदि भी भूमि प्रदूषण को बढ़ावा देती हैं | ये सभी कारक मिट्टी को विषाक्त बनाने के लिए जिम्मेदार हैं | मृदा प्रदूषण का सबसे बड़ा प्रभाव हैं, शुद्ध अनाजो की उत्पाद में कमी होना |  ये चार प्रमुख प्रकार के प्रदूषण हैं, जीवनशैली में बदलाव के कारण कई अन्य प्रकार के प्रदूषण भी देखे गए हैं जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक कचड़ा, रेडीएशन, रेडियोधर्मी प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण आदि | हम परमाणु युग में जी रहे हैं |इससे पृथ्वी के वातावरण में रेडियोधर्मी पदार्थों की उपस्थिति में वृद्धि हुई है | इसे रेडियोधर्मी प्रदूषण के रूप में जाना जाता है | हमारे चहुमुखी वातावरण में प्राणवायु (ऑक्सीजन) 21% हैं, नाइट्रोजन 78% हैं, कार्बनडाइऑक्साइड (CO2) 0.2% – 0.3% हैं | और इसी CO2 के बढ़ने से वैश्विक तापन में बढ़ोतरी होती हैं जिस वजह से हिमखंड पिघलने लगता हैं और जलवायु परिवर्तन आदि होने लगता हैं | ओजोन परत – वातावरण में फ्रिज, एसी आदि से निकलने वाली गैस फ़िरोन व क्लोरोफ़्लूरोकार्बन से भी प्रदूषण फैलता हैं जों ओजोन परत को प्रभावित करती हैं | ओजोन परत वायुमंडल में उपलब्ध एक ऐसी गैस की परत हैं जों सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणे को अवशोषित करती हैं | ओजोन परत में क्षरण के कारण सूर्य की किरण से निकलने वाली तापमान के प्रभाव से आंख में जलन, धुंधलापन, लू, कालापान, चर्मरोग आदि होने लगता हैं | प्रोद्योगिकी – प्रौद्योगिकी हमारी नई डिजिटल युग की जीवन रेखा है |

प्रौद्योगिकी का रीढ़ की हड्डी की तरह उपयोग किया जा रहा हैं | प्रौद्योगिकी हमारे दैनिक जीवन में छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक प्रवेश कर चुकी है | आज हम प्रौद्योगिकी के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते | चाहे वह खरीदारी हो, स्वचालित यंत्र हो, आईटी, चिकित्सा, अंतरिक्ष, शिक्षा, संचार आदि किसी के भी बारे में हो, हम आसानी से इस सभी में प्रौद्योगिकी की उपस्थिति का पता लगा सकते हैं | प्रौद्योगिकी के सकारात्मक के साथ नकारात्मक पहलु भी हैं, जैसे कि – ये हमें आलसी और बीमार भी बना रहे हैं, टेक्नोलॉजी की लत (इस पर निर्भर होना), याद्दाशत कम होना, अकेलापन और अवसाद , समय की बरबादी, खराब पॉश्चर, बेरोजगारी, गोपनीयता और असुरक्षा, आदि | प्रदूषण से बचाव के कुछ उपाय – वाहनों का प्रयोग सीमित करना, अपने आस-पास साफ-सफाई रखना , रिसाइकल और पुन: उपयोग , अधिक से अधिक पेड़ लगाना तथा उसकी कटाई पर रोक लगाना, स्वस्थ खान-पान, योगा-व्यायाम करना,

निबंध 

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