पर्व त्यौहार विशेष

अंग्रेजी वर्ष के अनुसार हिन्दुओ बीच आस्था व विश्वास का महापर्व दीपावली-छठ वर्ष का अंतिम मुख्य पर्व होता हैं | मगर बिते कुछ सालो से पच्चीस दिसंबर को तुलसी पूजन एक विशेष स्थान लेती जा रहीं हैं | हम बात करते है कि हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज़ हमें कैसे सकारात्मक रखती है, हमारे तन मन को स्वस्थ रखती है :- जब हम कोई पर्व मनाते है तो राजसिक और तामसिक भोजन से दूरी बनाते है, साफ सफाई का विशेष ध्यान रखते है| हम उपवास भी करते है, जिसपर मेडिकल साइंस भी कहती है कि हमें एक दिन की साप्ताहिक उपवास भी करनी चाहिए, जिससे शरीर की घर्षण से आतंरिक विकार मल मूत्र के द्वारा बाहर आ जाए या फिर हम उसके लिए प्रतिदिन योगा/व्यायाम करते है| इन सब चीजों से हमारा शरीर हल्का रहता है, हम नकारात्मक विचारों से दूर रह पाते है|त्यौहार से अपनों बीच एकजुटता का आपसी सामंजस्य बना रहता हैं | भारत त्योहारों का देश है, त्यौहार कठिनाई, पीड़ा तथा तनाव को भुलाने का साधन भी होता है| हर पर्व में कुछ नियम, बंधन होती है, जिसे हर कोई उस बंधनों की रक्षा कर अर्थात अपनी संस्कृति का पालन कर अनुशासित रूप में मनाते है, जहां पारिवारिक एकता में भी आपसी सामंजस्य बना रहता है| और हम अनुशासित व सकारात्मक जीवन व्यतीत कर पाते है| त्योहारों से एक नई आशा जगती है, कुछ अच्छा होने का उम्मीद बना रहता है| क्रमशः अब हम बात करते हैं धनतेरस से सामा-चकेवा तक के महत्व का :- #धनतेरस :- दीपावली से दो दिन पूर्व इस दिन माँ लक्ष्मी, श्री गणेश और कुबेर देव जी की भी पूजा होती है | धनतेरस भारत के अधिकतर जगहों पर सायंकाल दीपक जलाकर घर-द्वार, आंगन, दुकान आदि को सजाते हैं | एक पौराणिक कथा में हिन्दू मान्यता के अनुसार धन तेरस के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे | अमृत कलश के अमृत का पान करके देवता अमर हो गए थे | इसीलिए आयु और स्वस्थता की कामना हेतु धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि जी का भी पूजन किया जाता है | धनतेरस के दिन परंपरा रहीं हैं कि लोग बर्तन, सोने/चाँदी के सिक्के/आभूषण, साबुत धनिया, झाड़ू आदि की खरीददारी करते हैं | वर्तमान समय में धनतेरस पर अन्य कुछ भी नए चीजों की खरीददारी प्रचलन में हैं, क्योंकि ऐसा करना घर के लिए शुभ माना जाता हैं और ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन खरीदी गई कोई वस्तु तेरह गुणा अधिक लाभ प्रदान करती हैं | #दीपावली :- दिपो की श्रृंखला से मन को अालोकित करने वाला पर्व अर्थात दीपावली के शुभ अवसर पर प्रत्येक घर में भगवान श्री गणेश और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और साथ ही कई जगहों पर माँ काली की भी पूजा-अर्चना की जाती हैं ताकि घर में ऋद्धि-सिद्धिं बनी रहे | दीपावली के अवसर पर अपने आसपास के वातावरण में नयापन लाने का प्रयास किया जाता हैं, साथ ही माँ लक्ष्मी और श्री गणेश जी के आवागमन के स्वागत में घरो में, व्यापारिक स्थानों पर कई तरह के रंगोली बनाने का भी प्रचलन हैं | प्रत्येक वर्ष यह त्यौहार कार्तिक मास के माह में अक्टूबर नवंबर में मनाया जाता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार दिवाली के त्यौहार को इसलिए भी मनाया जाता है कि चौदह वर्ष के वनवास और रावण का वध करके भगवान श्री राम अपने जन्मभूमि अयोध्या लौटे थे | इसलिए वहां के लोगो के द्वारा अपने चारो ओर कई दिए जला कर उनका स्वागत किए थे , तब से ही दिवाली का त्यौहार प्रत्येक वर्ष अधर्म पर धर्म की, अंधियारे पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतिक के रूप में मनाया जाता है| वर्तमान समय में बिते कुछ सालो से अयोध्या वासी द्वारा अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन भव्य रूप से किया जा रहा | #गोवर्धन_पूजा :- गोवर्धन/अन्नकूट पूजा दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता हैं | इस पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है | इस दिन में श्रीकृष्ण के लीला का वर्णन हैं | नाराज इंद्रदेव द्वारा भारी बरसात कराए जाने पर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को ऊँगली पर उठा कर ब्रिज वासियो की रक्षा किए थे | जब गोवर्धन पर्वत को बचाया गया था तो लोगों नें खुशी जताई कि उनके भोजन का स्रोत बच गया है, और श्रद्धांजलि के रूप में, लोग भोजन की देवी यानी माँ अन्नपूर्ण को विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री प्रदान करते हैं | इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन और गायों के पूजा के निमित्त पके हुए अन्न को भोग में लगाए थे | इसीलिए इस दिन का नाम अंकूट पड़ा | कई जगह इस पर्व को गोवर्धन पूजा के नाम से जाना जाता है | इस दिन गाय के गोबर से श्री कृष्ण एवं गोवर्धन पर्वत की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है | गोवर्धन पूजा प्रकृति प्रेम को भी दर्शाता हैं | #भाई_दूज :- रक्षाबंधन के बाद, भाई दूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई-बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है | यह दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाता हैं | भाई दूज को लेकर यह मान्यता प्रचलित है, कि इस दिन विवाहित बहनें अपने भाइयों को अपने घर बुलाती है और भाई को तिलक लगाकर प्रेमपूर्वक भोजन कराती हैं जिससे परस्पर तो प्रेम बढ़ता ही है साथ ही बहन भगवान से भाई की लम्बी उम्र की कामना करती है | चूंकि इस दिन यमुना जी ने अपने भाई यमराज से वचन लिया था, उसके अनुसार भाई दूज मनाने से यमराज के भय से मुक्ति मिलती है, और भाई की उम्र व बहन के सौभाग्य में वृद्धि होती है | #छठ :-

महापर्व_छठपर्व बिहारियों की संस्कृति समझी जाने वाली सूर्योपासना का यह अनुपम छठ पर्व साल में दो बार मनाया जाता है | हिन्दू धर्म ग्रंथो व माह अनुसार एक चैत्र (मार्च-अप्रैल) माह में मनाया जाता है जिसे चैतीछठ या छोटी छठ पूजा कहा जाता है | और दूसरी दीपावली के समय कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) माह में मनाया जाता है जिसे कार्तिक छठ या बड़ी छठ पूजा कहा जाता है | यह चार दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है |
लोकआस्था व पवित्रता का विशेष ख्याल रखा जाने वाला यह पर्व दीपावली के चौथे दिन व भैयादूज के तीसरे दिन से यह छठ पर्व आरम्भ होता है | पहले दिन नहाय-खाय होता है उस दिन अरवा चावल व बिना प्याज़, लहसन के सेंधा नमक की प्रयोग में बनी कद्दू/लोकी/सजमाइन की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है | दूसरे दिन से सुबह के अर्घ्य तक छठ वर्तियों का उपवास आरम्भ होता है और दूसरे ही दिन शाम को खीर पूरी प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है जिसे खरना कहा जाता है | तीसरे दिन जल में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानि कच्ची दूध अर्पण करते है | और चौथे दिन भी जल में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते है | सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्युषा है | छठ पर्व में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त रूप से आराधना होती है | दीपावली के छठे दिन सायंकल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्युषा) व सातवे दिन प्रातः काल में सूर्य की पहली किरण (उषा) को अर्घ्य देकर नमन किया जाता है और इसके बाद वर्त की पारण की प्रक्रिया समाप्त होती है | ऐसा माना जाता है कि छठ पर्व ही ऐसा एक पर्व है जिसमे हम आने वाले कल की बेहतर के लिए ढ़लते हुए सूर्य की भी पूजा/प्रार्थना करते है |
छठवर्ती घर-परिवार में सुख शांति व संतान की लम्बी आयु के लिए वर्त रखती है | ये एक मात्र ही बिहार या पूरे भारत का ऐसा पर्व है जों वैदिक काल से चली आ रहीं है और बिहार की परंपरा बन चुकी है जिसका वर्णन महाभारत आदि में भी मिलता है | भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में गन्ने, केले का पेड़ आदि का प्रयोग कर एक घाट बनाया जाता है जहां बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी व गाय के गोबर से बने दीप व अन्य बर्तन, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की समाज बीच भरपूर मिठास का प्रसार कर पारिवारिक व सामाजिक एकता की मिसाल पेश की जाती है |

#सामा_चकेवा:- छठ महापर्व के प्रात:कालीन अर्घ्य के बाद मिथिलांचल के प्रसिद्ध पर्व सामा-चकेवा की शुरुआत होती हैं | यह लोकपर्व रक्षाबंधन एवं भाईदूज के बाद तीसरा ऐसा पर्व हैं जिसे भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है | इसमें बहनें सात दिनों तक रोज सामा-चकेवा, चुगला, पक्षी आदि की छोटे-छोटे मिट्टी की मूर्ति बनाकर उन्हें पूजती हैं | हर दिन गीत-नाद होता है | इसे खासतौर पर बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है | इसमें सामा स्त्री (बहन) हैं तो चकेवा पुरुष (भाई) हैं | पौराणिक कथा अनुसार अपनी बहन सामा को पक्षी से मनुष्य रूप में लाने के लिए चकेवा ने तपस्या करके सामा को पक्षी रूप से पुन: मनुष्य रूप में लाया | अपने भाई के समर्पण व त्याग देखकर सामा द्रवित हो गई, और मान्यता के अनुसार उसी की याद में तब से बहनें अपनी भाइयों के लिए यह पर्व मनाती आ रही हैं | सामा-चकेबा यानि भाई-बहन के इस कथा संसार में एक चरित्र है चुगला | जैसा कि नाम से स्पष्ट है, वह चुगली करता है, झूठी बातें फैलाता है | उसी के चलते सामा को कठोर श्राप झेलना पड़ा | इसलिए इस त्योहार में चुगले का मुंह काला किया जाता है |

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